भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन: आर्कटिक क्षेत्र में अपनी पैठ मजबूत करने की तैयारी में भारत, जानें क्या है नई दिल्ली का एजेंडा
भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन: प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे यात्रा से आर्कटिक में भारत की रणनीतिक उपस्थिति पर जोर। जानें जलवायु, ऊर्जा और वैज्ञानिक शोध में भारत के लक्ष्य।
नई दिल्ली/ओस्लो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा और आगामी 'भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन' भू-राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इस शिखर सम्मेलन में नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड और डेनमार्क के शीर्ष नेता हिस्सा लेंगे। इस सम्मेलन का उद्देश्य भारत और नॉर्डिक देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को एक नई ऊंचाई देना है, जिसमें तकनीक, नवाचार (Innovation), हरित ऊर्जा और स्थिरता जैसे विषय प्राथमिकता पर रहेंगे।
सम्मेलन के मुख्य बिंदु
शिखर सम्मेलन के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंध केंद्र में हैं। भारत के लिए नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के कई गहरे कारण हैं। आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2024 में भारत का नॉर्डिक देशों के साथ व्यापार 19 बिलियन डॉलर के स्तर पर था, जिसे दोनों पक्ष और अधिक बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह सम्मेलन रक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और 'ब्लू इकोनॉमी' में सहयोग की नई संभावनाएं खोलेगा।
आर्कटिक में भारत की बढ़ती दिलचस्पी क्यों?
हालांकि भारत की सीमा आर्कटिक से नहीं जुड़ी है, लेकिन इस क्षेत्र में नई दिल्ली की सक्रियता दशक पुरानी है। भारत 1920 की 'स्वालबार्ड संधि' (Svalbard Treaty) का हस्ताक्षरकर्ता है, जिसके तहत उसे आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध करने का अधिकार प्राप्त है।
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हिमाद्रि अनुसंधान केंद्र: भारत ने 2007 में अपना पहला वैज्ञानिक अभियान आर्कटिक भेजा था और 2008 में 'हिमाद्रि' नामक शोध स्टेशन स्थापित किया।
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IndARC का योगदान: 2014 में भारत ने 'IndARC' लॉन्च किया, जो देश की पहली अंडरवॉटर मूरेड ऑब्जर्वेटरी है।
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रणनीतिक और आर्थिक हित: आर्कटिक क्षेत्र हाइड्रोकार्बन, प्राकृतिक गैस और खनिजों का भंडार माना जाता है। भारत का लक्ष्य इन संसाधनों के दोहन और इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति दर्ज करने का है।
नई दिल्ली का बड़ा लक्ष्य: 'इंडिया-नॉर्डिक आर्कटिक मैकेनिज्म'
भारत आर्कटिक काउंसिल में 2013 से ही 'ऑब्जर्वर' का दर्जा रखता है। मार्च 2022 में भारत ने अपनी 'आर्कटिक नीति' भी जारी की थी। अब खबरें हैं कि नई दिल्ली एक 'इंडिया-नॉर्डिक आर्कटिक मैकेनिज्म' बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करना, कनेक्टिविटी बढ़ाना और इस संवेदनशील क्षेत्र के गवर्नेंस में सक्रिय भूमिका निभाना है।
भारत का प्रयास है कि वह नॉर्डिक देशों की तकनीकी दक्षता और अपनी बढ़ती शोध क्षमता को मिलाकर वैश्विक स्तर पर आर्कटिक से जुड़े फैसलों में अपनी आवाज बुलंद कर सके। यह सम्मेलन न केवल राजनयिक संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक साझा मंच भी प्रदान करेगा।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक बयानों के आधार पर केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। लेख में व्यक्त किए गए विचार और विश्लेषण स्वतंत्र हैं।
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