जयपुर में जीएसटी चोरी का बड़ा खुलासा: फर्जी बिलिंग के जरिए 13.46 करोड़ की धोखाधड़ी, एक गिरफ्तार
जयपुर में जीएसटी चोरी का खुलासा: फर्जी बिलिंग और अवैध आईटीसी के जरिए 13.46 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी करने वाला गिरफ्तार। वाणिज्यिक कर विभाग की बड़ी कार्रवाई।
जयपुर: वाणिज्यिक कर विभाग की प्रवर्तन शाखा ने जीएसटी चोरी और फर्जी बिलिंग के एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया है। विभाग ने इस मामले में जयपुर के मुरलीपुरा क्षेत्र निवासी नितेश कुमार सिंघल को गिरफ्तार किया है। आरोपी पर आरोप है कि उसने फर्जी फर्मों के माध्यम से अवैध रूप से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ उठाकर सरकारी खजाने को 13.46 करोड़ रुपये का चूना लगाया है।
कैसे अंजाम दिया गया घोटाला?
जांच में सामने आया कि आरोपी नितेश कुमार सिंघल, जो 'मैसर्स जयपुर ट्रेडर्स' का संचालन कर रहा था, ने सुनियोजित तरीके से फर्जी बिलिंग का जाल बुना था। आरोपी ने जयपुर स्थित कई अन्य फर्मों के साथ मिलकर अवैध रूप से बिल जारी किए और जीएसटी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए आईटीसी का गलत दावा पेश किया। विभाग की गहन जांच के दौरान जब इन लेनदेन की सत्यता की परख की गई, तो पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ गया।
विभाग की सख्त कार्रवाई
वस्तु एवं सेवाकर (GST) अधिनियम, 2017 की धारा 69 के तहत कार्रवाई करते हुए प्रवर्तन शाखा ने आरोपी को गिरफ्तार कर विशेष न्यायालय (आर्थिक अपराध), जयपुर में पेश किया। न्यायालय ने आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody) में भेजने का आदेश दिया है। विभाग अब इस प्रकरण से जुड़े अन्य व्यक्तियों और संदिग्ध फर्मों की भूमिका की भी जांच कर रहा है, ताकि इस पूरे नेटवर्क को बेनकाब किया जा सके।
यह कार्रवाई डॉ. मीनाक्षी अग्रवाल (संयुक्त आयुक्त, प्रवर्तन शाखा) के निर्देशन में एक विशेष टीम द्वारा अंजाम दी गई, जिसमें सहायक आयुक्त दिनेश कुमार सोनी, मनोज कुमार गोरा और राज्य कर अधिकारी हिमांशु लोदी व विक्रमादित्य चौहान शामिल थे।
विभाग का संदेश
वाणिज्यिक कर विभाग ने स्पष्ट किया है कि कर चोरी और फर्जी बिलिंग के खिलाफ उनका अभियान आगे भी जारी रहेगा। विभाग का मुख्य उद्देश्य पारदर्शी राजस्व प्रणाली को बनाए रखना और कर चोरी करने वाले तत्वों पर नकेल कसना है। हाल के दिनों में विभाग ने फर्जी बिलिंग के मामलों में सक्रियता बढ़ाई है, जिससे कर चोरों में हड़कंप मचा हुआ है।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह समाचार लेख आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति और विभागीय जानकारी पर आधारित है। यह सूचना के उद्देश्य से है। कानूनी मामलों में अधिकृत अदालती दस्तावेजों को ही प्रमाण माना जाना चाहिए।
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