NCERT किताब विवाद: ब्लैकलिस्टेड शैक्षणिकों ने SC में सुनवाई की मांग की
हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यपुस्तक बोर्ड (NCERT) की एक किताब को लेकर देशभर में शिक्षा जगत और मीडिया में तीव्र बहस छिड़ गई है। कुछ शैक्षणिकों की एक समिति, जिनका नाम विवादित सूची में आने के बाद सार्वजनिक ध्यान में आया, ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया है कि NCERT किताब विवाद पर उनकी सुनवाई हो। उनका आरोप है कि पाठ्यपुस्तकों से हटाए गए अध्याय और विषयों से लेकर लेखकों के ब्लैकलिस्ट होने तक कई निर्णय शिक्षा के सिद्धांतों और इतिहास के निष्पक्ष अध्ययन के लिए हानिकारक हैं।
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब कुछ शिक्षाविदों ने यह दावा किया कि प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों को हटाया गया है या उनमें बदलाव किये गये हैं जो इतिहास, संस्कृति या समाजशास्त्र के मूल तत्त्वों का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने NCERT पुस्तक को “पक्षपातपूर्ण” और “तथ्यों के विरुद्ध” बताया और कहा कि इससे विद्यार्थियों की शिक्षा प्रभावित हो सकती है। इस पर व्यापक स्तर पर आलोचना और समर्थन की आवाजें दोनों उठी हैं।
कई आलोचकों का कहना है कि शिक्षा जगत में अकादमिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण होती है और ऐसे निर्णयों पर विशेषज्ञों की राय महत्वपूर्ण होती है। दूसरी ओर, कुछ लोगों का कहना है कि पाठ्यपुस्तकों में समावेशी और समकालीन विषयों का होना आवश्यक है ताकि विद्यार्थी एक व्यापक दृष्टिकोण से अध्ययन कर सकें।
अब विवाद और गहरा तब गया है जब उन शैक्षणिकों की सूची, जिन्हें कथित तौर पर ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था, सार्वजनिक हुई। इन शैक्षणिकों का कहना है कि वे कभी भी व्यक्तिगत रूप से ऐसे निर्णय का समर्थन नहीं करते हैं और यह पूरी तरह से एक सामूहिक निर्णय था। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना गलत है और यह निर्णय विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के समूह की सिफारिशों पर आधारित था।
इस विवाद के ताजा चरण में, विवादित शैक्षणिकों ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय से यह अनुरोध किया है कि उन्हें अदालत में अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाये। उनका तर्क है कि न केवल उनके खिलाफ उठाये गये आरोप गलत हैं, बल्कि इससे उनके करियर और प्रतिष्ठा को भी नुक़सान हो रहा है। उन्होंने बताया कि एक शिक्षाविद के रूप में उनका उद्देश्य विद्यार्थियों को सही और निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना ही रहा है, न कि इतिहास या समाज के तथ्यों को तोड़-मरोड़ना।
शैक्षणिकों के वकीलों ने अदालत में यह भी कहा कि ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय ना सिर्फ शिक्षा नीति के तत्वों पर प्रश्न उठाता है बल्कि यह विचाराधीन प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी पाठ्यपुस्तक में बदलाव या विषय हटाने से पहले व्यापक परामर्श और निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
इस पूरे विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर उच्च शिक्षा संस्थानों, विद्यार्थियों और अभिभावकों द्वारा भी ध्यान से देखा जा रहा है। कई लोग इस बहस को शिक्षा की स्वतंत्रता, अकादमिक स्वतंत्रता, और पाठ्यपुस्तक नीति में पारदर्शिता के मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक संवाद के रूप में मानते हैं।
अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को कब और किस रूप में सुनेगा, साथ ही यह भी कि न्यायालय इस प्रकार के विवादों में शिक्षा नीति, पाठ्यपुस्तक लेखकों की स्वतंत्रता और विद्यार्थियों के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करेगा। यह मामला भविष्य में शिक्षा नीति के निर्णयों पर एक बड़े अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।
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