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राजस्थान

बाड़मेर: निहारिका टाइम्स के पत्रकार सबलसिंह भाटी पर प्राणघातक हमला

द्वारा News Room 📅 15 Jul 2023 👁️ 48 व्यूज़ ⏱️ 1 मिनट रीड
बाड़मेर: निहारिका टाइम्स के पत्रकार सबलसिंह भाटी पर प्राणघातक हमला

Barmer: आरटीआई कार्यकर्ता और निहारिका टाइम्स से पत्रकार सबलसिंह भाटी हरसाणी, पर कुछ गुंडों ने प्राणघातक हमला कर दिया। सबल सिंह भाटी को हाथ व पैर में गंभीर चोटे आई है । सबल सिंह ने पुलिस को बताया कि हमलावर 4-5 थे जो ब्लैक स्कॉर्पियो से फरार आए थे । सबलसिह को बाड़मेर अस्पताल में भर्ती कराया गया है ।

https://twitter.com/BarmerDurg/status/1581214630621237253?t=XE2awJs0T0SGisnBm992Ug&s=19

राजस्थान में 2022 में आरटीआई कार्यकर्ता और पत्रकारों पर प्राणघाती हमले कुछ ज्यादा ही सामने आए है । मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की है, सरकार के लिए बहुत ही गहन बिंदु है जिस पर सरकार को सोचना चाहिए और कानून बनाना चाहिए ।

आरटीआई कार्यकर्ता अमराराम विवाद

बाड़मेर जिले के गिड़ा थाना इलाके में कुछ बदमाशों ने गत 21 दिसम्बर 2021 को आरटीआई कार्यकर्ता अमराराम पर जानलेवा हमला कर दिया। हमलावरों ने अमराराम का अपहरण करने के बाद उसकी पिटाई कर उसे अमानवीय यातनाएं दीं। हमलावरों ने आरटीआई कार्यकर्ता के दोनों पैर और एक हाथ तोड़ दिया। यही नहीं क्रूरता की हदें पार करते हुए उसके पैरों में कील ठोक दी थी। पांवों में सरिया डालकर घुमाया। उसके बाद उसे गांव के पास सड़क किनारे फेंक गए। जिसमे पुलिस ने कुछ अपराधियों की गिरफ्तारी भी की थी । सोशल मीडिया पर यह विवाद खूब चला और परिजनों ने धरना भी दिया ।

हमारा समाचार के संपादक पर हमला

जयपुर के कालवाड़ इलाके में, कथित तौर पर जमीन कब्जाने और एक सरपंच के द्वारा सरकारी निधि के हेरफेर की रिपोर्ट छपने के एक हफ्ते के भीतर ही तीन पत्रकारों पर रॉड और पाइपों से कथित तौर पर हमला किया गया।
स्थानीय दैनिक हमारा समाचार के संपादक रामनिवास चौधरी, उनके संवाददाता साथी कमल देगड़ा, और यूट्यूब पर मरुधर बुलेटिन के नाम से समाचार चैनल चलाने वाले विवेक सिंह जादौन को कथित तौर पर करीब 10 लोगों के द्वारा हमला किए जाने के बाद एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया ।

अब निहारिका टाइम्स के पत्रकार पर प्राणघाती हमला किया है। राजस्थान में पत्रकार सच लिखने की कीमत चुका रहे है । ज्यादातर मामले दब जाते है, 100 में से करीब 10-12 मामले ही सोशल मीडिया तक पहुंच पाते है और जो नहीं पहुंच पाते वो अन्याय की काल कोठरी में दब जाते है, मीडिया भी उन खबरों को जगह नहीं देता है।

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