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गरीबी और सिस्टम की मार: आदिवासी भाई बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा, मचा हंगामा

ओडिशा के क्योंझर में एक व्यक्ति द्वारा बहन का कंकाल बैंक ले जाने की घटना ने बैंकिंग प्रक्रिया, प्रशासनिक संवेदनशीलता और गरीबों की मुश्किलों पर गंभीर सवाल खड़े किए।
द्वारा News Room 📅 29 Apr 2026 👁️ 145 व्यूज़ ⏱️ 1 मिनट रीड
गरीबी और सिस्टम की मार: आदिवासी भाई बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा, मचा हंगामा

ओडिशा के क्योंझर ज़िले से सामने आई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। एक व्यक्ति को अपनी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकालने के लिए उसका कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक तक जाना पड़ा। यह घटना न केवल एक व्यक्ति की मजबूरी है, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और जमीनी हकीकत को भी उजागर करती है।


क्या है पूरा मामला?

दियानाली गांव के रहने वाले 52 वर्षीय जीतू मुंडा अपनी बहन कलरा मुंडा के खाते से ₹19,300 निकालने के लिए ओडिशा ग्रामीण बैंक की मल्लीपोशी शाखा पहुंचे थे।

56 वर्षीय कलरा मुंडा अपने पति और बेटे की मौत के बाद मायके में रहकर दिहाड़ी मजदूरी से जीवनयापन कर रही थीं। कुछ महीने पहले उन्होंने एक बछड़ा बेचकर ₹19,300 अपने बैंक खाते में जमा किए थे।

दो महीने पहले उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद जीतू मुंडा बैंक पहुंचे, लेकिन उनसे मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी वारिस के दस्तावेज़ मांगे गए।


मजबूरी में उठाया गया चौंकाने वाला कदम

जीतू मुंडा के अनुसार, उन्होंने कई बार बैंक जाकर अपनी स्थिति समझाने की कोशिश की, लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। निराश और हताश होकर उन्होंने एक बेहद कठोर कदम उठाया।

वह करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर श्मशान घाट पहुंचे, अपनी बहन के अवशेष निकाले, उन्हें एक बोरी में रखा और कंधे पर उठाकर बैंक पहुंच गए, ताकि वह अपनी बात का प्रमाण दे सकें।

बैंक में यह दृश्य देखकर कर्मचारी और ग्राहक स्तब्ध रह गए। इसके बाद पुलिस और प्रशासन को बुलाया गया। अधिकारियों के समझाने पर जीतू ने कंकाल को वापस श्मशान घाट में रख दिया।


बैंक का पक्ष

बैंक मैनेजर का कहना है कि उन्होंने सभी प्रक्रियाओं का पालन किया। उनके अनुसार, शुरुआत में जीतू ने कहा था कि उनकी बहन जीवित हैं लेकिन बीमार होने के कारण आ नहीं सकतीं। बाद में उन्होंने बताया कि उनकी मृत्यु हो चुकी है।

बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि खाते के अन्य कानूनी वारिस भी हैं, इसलिए बिना उचित दस्तावेज़ के राशि देना संभव नहीं था।


मामले का समाधान और प्रशासन की कार्रवाई

28 अप्रैल को जांच के बाद खाते में जमा ₹19,410 (ब्याज सहित) की राशि जीतू मुंडा और अन्य कानूनी वारिसों को दे दी गई। उन्हें यह राशि आपस में बराबर बांटने की सलाह दी गई।

ज़िला प्रशासन ने इस घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त की और तुरंत राहत के रूप में:

  • ₹30,000 की आर्थिक सहायता प्रदान की
  • मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया
  • कानूनी वारिस प्रमाण पत्र उपलब्ध कराया

प्रशासन ने आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं (ट्विटर पर साझा बयान)

किरोड़ी लाल मीणा (राजस्थान के कैबिनेट मंत्री) ने ट्वीट किया:

“जीतू मुंडा की बेबसी और पीड़ा देखकर कलेजा कांप उठा। एक गरीब आदिवासी के साथ कागजी खानापूर्ति के नाम पर इस तरह की प्रताड़ना किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है।
मेरा ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री @MohanMOdisha जी से पुरजोर आग्रह है कि इस मामले में तत्काल और कठोरतम कार्रवाई की जाए।
जीतू मुंडा का दर्द मेरा दर्द है, उनकी पीड़ा मेरी पीड़ा है। मेरा कर्तव्य है कि संकट की इस घड़ी में मैं उनके साथ खड़ा रहूं।
मैं अपना एक माह का वेतन उनके परिवार को समर्पित करूंगा और जल्द ही यह राशि उन्हें पहुंचाई जाएगी।
यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति खुद को असहाय न महसूस करे।”


कांग्रेस पार्टी ने ट्विटर पर पोस्ट किया:

“ओडिशा की ये घटना मानवता को शर्मसार करती है।

जीतू मुंडा को अपनी बहन का कंकाल कंधे पर लादकर बैंक जाने को मजबूर होना पड़ा।

जीतू की बहन के खाते में 19,300 रुपए थे। जब वह पैसे निकालने बैंक पहुंचे तो उनसे कहा गया कि मृत खाताधारक को लेकर आओ और कई कागजात जमा करो। मजबूरी में उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।

जिस देश में अमीरों के लाखों करोड़ रुपए के कर्ज आसानी से माफ कर दिए जाते हैं, उसी देश में एक गरीब को 19 हजार रुपए के लिए इस तरह परेशान किया जाता है।

यह घटना देश की असली तस्वीर दिखाती है—जहां गरीबों की सुनवाई नहीं होती और सिस्टम पूरी तरह शक्तिशाली लोगों के कब्जे में है।”


इस घटना से उठते बड़े सवाल

1. कठोर और असंवेदनशील प्रक्रिया

नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी गंभीर परिणाम ला सकती है।

2. दस्तावेज़ों की कमी

ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरी कागजात समय पर न मिलना बड़ी समस्या है।

3. वित्तीय पहुंच की बाधाएं

बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के बावजूद गरीबों के लिए अपने ही पैसे तक पहुंच आसान नहीं है।

4. मानव गरिमा का मुद्दा

यह घटना बताती है कि संकट की घड़ी में आम लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।


निष्कर्ष

यह घटना केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कमियों को उजागर करती है। नियमों के साथ-साथ संवेदनशीलता और सहानुभूति भी उतनी ही जरूरी है।

यदि प्रशासन और संस्थाएं समय रहते मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं, तो भविष्य में ऐसी दर्दनाक और शर्मनाक घटनाओं को रोका जा सकता है।

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