पेंटागन के एक फैसले ने फिर सुलगाई 200 साल पुरानी बहस: क्या 'मॉर्मन' असल में ईसाई हैं?
धर्म और पहचान के मुद्दे हमेशा से संवेदनशील रहे हैं, लेकिन जब अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) का एक सामान्य प्रशासनिक फैसला दो सदी पुराने धार्मिक विवाद को फिर से जिंदा कर दे, तो मामला सुर्खियों में आना लाजमी है। हाल ही में पेंटागन ने सेना के आधिकारिक रिकॉर्ड में 'ईसाई' धर्मों की सूची में कुछ ऐसे बदलाव किए, जिसने इस पुरानी बहस को जन्म दे दिया कि क्या 'द चर्च ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर-डे सेंट्स' (जिन्हें आमतौर पर मॉर्मन कहा जाता है) को ईसाई धर्म का हिस्सा माना जा सकता है?
यह विवाद केवल एक सैन्य सूची तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार अमेरिकी राजनीति, धार्मिक मान्यताओं और सेना के भीतर छिपे भेदभाव से जुड़े हैं।
राजनेताओं का विरोध और पेंटागन का 'यू-टर्न'
दरअसल, अमेरिकी रक्षा विभाग ने हाल ही में सैन्य कर्मियों के लिए उपलब्ध 200 से अधिक धार्मिक मान्यताओं की सूची को व्यवस्थित और छोटा करने का प्रयास किया था। इस प्रक्रिया में नास्तिक और विक्कन जैसी श्रेणियों को हटाया गया, लेकिन विवाद तब खड़ा हुआ जब 'लैटर-डे सेंट्स' (मॉर्मन) को ईसाई धर्म की सूची से बाहर रखा गया।
इस कदम पर उटाह के रिपब्लिकन सीनेटर माइक ली और जॉन कर्टिस (जो खुद मॉर्मन हैं) ने कड़ी आपत्ति जताई। सीनेटर कर्टिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि लैटर-डे सेंट्स अमेरिका के सबसे देशभक्त और सेवा-भाव रखने वाले नागरिक हैं। उन्होंने सरकार द्वारा उनके धर्म की पहचान तय करने को "अस्वीकार्य" बताया। सीनेटर ली ने भी स्पष्ट किया कि उनका धर्म उनकी ईसाई पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है, "भले ही पेंटागन कुछ भी सोचे।"
इस भारी राजनीतिक और सामाजिक विरोध के बाद, पेंटागन ने सोमवार को मामले को शांत करने के लिए एक अलग रास्ता अपनाया। रक्षा विभाग ने मॉर्मन को ईसाई का टैग देने के बजाय, कैथोलिक, लूथरन और पेंटेकोस्टल जैसी 20 अन्य प्रमुख परंपराओं से भी 'ईसाई' का लेबल हटा लिया। विभाग ने सफाई दी कि उनका उद्देश्य किसी भी धर्म की वैधता पर मुहर लगाना नहीं है, बल्कि सैन्य पादरियों (चैपलेन्स) को संसाधन आसानी से उपलब्ध कराना है।
आखिर विवाद की जड़ क्या है?
मॉर्मन चर्च के दुनियाभर में लगभग 1.8 करोड़ सदस्य हैं, जिनमें सबसे बड़ी आबादी उटाह में है। चर्च आधिकारिक तौर पर खुद को एक "ईसाई चर्च" मानता है। उनका दावा है कि वे न्यू टेस्टामेंट (बाइबिल) के मूल स्वरूप का पुनरुद्धार हैं और ईसा मसीह में उनकी गहरी आस्था है।
हालांकि, मुख्यधारा के ईसाइयों और मॉर्मन के बीच वैचारिक खाई बहुत गहरी है। क्लेयरमोंट ग्रेजुएट यूनिवर्सिटी के स्कॉलर मैथ्यू बोमन के अनुसार, सबसे बड़ा अंतर ईश्वर और 'ट्रिनिटी' (पवित्र त्रिमूर्ति) की अवधारणा को लेकर है। मुख्यधारा के ईसाई मानते हैं कि ईश्वर एक असीम आत्मा है, जबकि मॉर्मन संस्थापकों का मानना था कि ईश्वर कभी इंसान थे जिन्होंने देवत्व प्राप्त किया। इसके अलावा, मॉर्मन 'नाइसिन क्रीड' को भी खारिज करते हैं, जो ट्रिनिटी को एक ईश्वरीय सत्ता मानता है। यही कारण है कि 2012 में वेटिकन (कैथोलिक चर्च) ने भी स्पष्ट कर दिया था कि मॉर्मन की मान्यताएं इतनी अलग हैं कि उनके बपतिस्मा को ईसाई संस्कार नहीं माना जा सकता।
राजनीति और सेना में भेदभाव का इतिहास
यह धार्मिक तनाव अमेरिकी राजनीति में भी बार-बार उभरता रहा है। 2012 में जब मिट रोमनी (जो एक मॉर्मन हैं) राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब यह मुद्दा काफी गरमाया था। हालांकि मॉर्मन और इवेंजेलिकल ईसाई दोनों ही गर्भपात और LGBTQ+ जैसे मुद्दों पर रूढ़िवादी विचार रखते हैं, फिर भी उनके बीच दूरियां बनी हुई हैं। डोनाल्ड ट्रंप के उभार के बाद से कुछ इवेंजेलिकल समूहों ने मॉर्मन को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना लिया है, यहां तक कि कुछ उन्हें 'विधर्मी' भी कहते हैं।
इस भेदभाव का असर सेना में भी देखने को मिला है। 1984 से 2005 तक वायुसेना में मॉर्मन पादरी (चैपलेन) रहे फिलिप मैक्लेमोर ने बताया कि मुख्यधारा के ईसाई पादरियों ने उन्हें कभी ईसाई नहीं माना। उन्हें शक की नजर से देखा जाता था कि कहीं वे सेना में अपने धर्म का प्रचार तो नहीं कर रहे। हालांकि, मैक्लेमोर मानते हैं कि आम सैनिकों के लिए पादरी का संप्रदाय कोई मायने नहीं रखता; उन्हें मानसिक स्वास्थ्य, काम या शादी की समस्याओं को सुलझाने के लिए सिर्फ एक मार्गदर्शक की जरूरत होती है।
टिप्पणियां (0)
अपनी राय दें