नई दिल्ली में ’17वां एग्रीकल्चर लीडरशिप अवार्ड’ संपन्न: उत्तर प्रदेश और गुजरात को मिला सम्मान, रक्षा मंत्री और राज्यपाल ने दिया प्राकृतिक खेती का संदेश
नई दिल्ली/जयपुर: देश की राजधानी नई दिल्ली के एक प्रतिष्ठित होटल में ’17वें राष्ट्रीय एग्रीकल्चर लीडरशिप अवार्ड’ (17th National Agriculture Leadership Award) समारोह का भव्य आयोजन किया गया। इस गरिमामयी कार्यक्रम में देश के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने संयुक्त रूप से कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट और अनुकरणीय कार्य करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया। इस वर्ष यह प्रतिष्ठित अवार्ड दो प्रमुख और महत्वपूर्ण श्रेणियों के अंतर्गत उत्तर प्रदेश और गुजरात को प्रदान किया गया। समारोह में दोनों राज्यों का प्रतिनिधित्व वहां के माननीय कृषि मंत्रियों ने किया और मंच पर उपस्थित होकर यह गौरवशाली सम्मान ग्रहण किया।
इस विशेष आयोजन का मुख्य उद्देश्य भारतीय कृषि व्यवस्था में तकनीकी नवाचारों, सतत विकास और उत्कृष्ट नेतृत्व को पहचान देना तथा कृषि से जुड़े नीति-निर्माताओं को प्रोत्साहित करना रहा।
भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है कृषि: राज्यपाल
समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में कृषि की केंद्रीय भूमिका को बहुत ही प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र केवल देश की एक विशाल आबादी को खाद्यान्न ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि यह हमारे बड़े और बुनियादी उद्योगों को प्रचुर मात्रा में कच्चा माल (Raw Material) भी प्रदान करता है। यही कारण है कि कृषि को आज भी देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त और गतिमान बनाए रखने का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
रोजगार और जीडीपी में कृषि का योगदान: आज के आधुनिक और औद्योगिक युग में भी भारत की लगभग आधी आबादी (50%) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका और रोजगार के लिए कृषि पर ही निर्भर है। इसके साथ ही, देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि और इससे जुड़े संबद्ध उद्योगों का योगदान वर्तमान में भी 18 प्रतिशत से अधिक बना हुआ है, जो इसके महत्व को खुद-ब-खुद बयां करता है।
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन का स्मरण और बदलती प्राथमिकताएं
अपने संबोधन के दौरान राज्यपाल ने भारत में हरित क्रांति के जनक और महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के ऐतिहासिक योगदान की विशेष चर्चा की। उन्होंने कहा कि एक दौर वह था जब देश गंभीर खाद्यान्न संकट (Food Crisis) से जूझ रहा था, तब डॉ. स्वामीनाथन के अभूतपूर्व प्रयासों, दूरदर्शिता और वैज्ञानिक अनुसंधान के कारण देश में कृषि उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई और भारत खाद्यान्न के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो सका।
हालांकि, राज्यपाल ने बदलते समय के साथ प्राथमिकताओं को बदलने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज जब हमारा देश खाद्यान्नों के मामले में न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि अधिशेष (Surplus) की स्थिति में है, तब यह बेहद जरूरी हो गया है कि हम अपनी मिट्टी की सेहत पर ध्यान दें। अब किसानों को केवल मात्रात्मक उत्पादन बढ़ाने के बजाय, धरती की उर्वरा शक्ति को अक्षुण्ण रखने और अधिक पोषक व स्वास्थ्यप्रद फसलों के उत्पादन की ओर प्रेरित किया जाना चाहिए।
जैविक खेती के मुकाबले प्राकृतिक खेती पर विशेष जोर
राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने कृषि पद्धतियों में बड़े सुधार की वकालत करते हुए ‘जैविक खेती’ (Organic Farming) की तुलना में ‘प्राकृतिक खेती’ (Natural Farming) को बड़े पैमाने पर अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि रसायनों के बढ़ते प्रयोग ने मिट्टी को बंजर और फसलों को अस्वस्थ बना दिया है। ऐसे में प्राकृतिक खेती ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और मिट्टी के स्वास्थ्य को एक साथ सुरक्षित रख सकता है। उन्होंने कृषि क्षेत्र से जुड़े संगठनों और वैज्ञानिकों से इस दिशा में देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाने का आग्रह किया।
जल संरक्षण: “पानी की बचत ही उसका उत्पादन है”
कृषि के साथ-साथ जल संकट की चुनौती पर बात करते हुए राज्यपाल ने जल संरक्षण (Water Conservation) के लिए विशेष और सामूहिक प्रयास किए जाने की बात कही। उन्होंने एक बेहद व्यावहारिक सूत्र देते हुए कहा कि “पानी की बचत ही वास्तव में पानी का उत्पादन है।”
गिरते भूजल स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) की तकनीकों को अनिवार्य रूप से लागू करने पर बल दिया। उन्होंने सभी राज्यों और किसानों से आह्वान किया कि वे अपनी कृषि पद्धतियों में बदलाव लाएं और पारंपरिक रूप से अधिक पानी सोखने वाली फसलों के स्थान पर कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली आधुनिक फसलों को प्राथमिकता दें। इसके साथ ही, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों के माध्यम से राज्यों को कृषि क्षेत्र में अधिक समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना होगा।